Bhartendu Harishchandra Ka Jeevan Parichay

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जीवन परिचय – Bhartendu Harishchandra Ka Jeevan Parichay

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Bhartendu Harishchandra Ka Jeevan Parichay

जीवन परिचय

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म भाद्रपद शुक्ल 5 सं०1907 वि० (सन्‌ 1850 ई०) में काणी के एक वैश्य परिवार में हुआ। इनके पिता गोपालचन्द्र (उपनाम गिरधार दास) बड़े काव्य-रसिक व्यक्ति थे।

भारतेन्दु जी जन्मजात कवि थे। पाँच वर्ष की आयु में ही उन्होंने निम्नलिखित दोहा बनाकर अपने पिता की सुनाया और उनसे सुकवि बनने का आशीर्वाद प्राप्त किया-

“ले ब्योढा ठाढ़े भये, श्री अनिरुद्ध सुजान।

बाणासुर, की सैन्य को, हनन लगे ‘बलवान्‌॥

गद्य शैली का निर्धारण

भारतेन्दु जी से पहले हिन्दी गद्य का कोई निश्चित स्वरूप न था, हिन्दी गद्य की कोई निर्धारित शैली भी न थी। एक ओर राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ की उर्दूप्रधान शैली थी तो दूसरी ओर थी राजा लक्ष्मणसिंह की संस्कृत निष्ठ शुद्ध भाषा-शैली। ये दोनों ही हिन्दी जगत में मान्य न हो सकीं। भारतेन्दु जी ने मध्यम मार्ग अपनाया और हिन्दुस्तानी खड़ी बोली को हिन्दी गद्य की आदर्श भाषा-शैली के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी शैली में न अरबी-फारसी के शब्दों की भरमार थी, न संस्कृत शब्दों का आग्रह था। उनकी भाषाशैली में न ‘सितारे-हिन्द’ का उर्दूपन था, न राजा लक्ष्मणसिंह की संस्कृतनिष्ठता। वास्तव में उन्होंने एक ऐसी सर्वमान्य शैली का प्रयोग किया जो हिन्दी गद्य साहित्य के विकास के लिए सर्वथा उपयुक्त सिद्ध हुई। गद्य के क्षेत्र में ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली की स्थापना भारतेनंदु जी का अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य था।

विविध गद्य विधाओं का आविर्भाव–

भारतेन्दु जी का समय हिन्दी गद्य साहित्य के आविर्भाव का काल था। भारतेन्द्र जी ने हिन्दी में नाटक, निबंध, कहानी तथा जीवनी आदि विविध गद्य विधाओं को जन्म दिया। उन्होने स्वयं लिखा और दूसरों को लिखने के लिए प्रेरित किया। उनके मित्रों ने भी हिंदी भाषा के विकास में उन्हें सहयोग दिया। अनेक नाटक, निबन्ध, उपन्यास तथा कहानियाँ इस काल में लिखे गये। विविध गद्य विधाओं से हिन्दी साहित्य का भण्डार भरा गया। उनके मित्रों और सहयोगियों का एक बड़ा समुदाय बन गया जिसे “भारतेन्दु-मण्डल” के नाम से जाना गया। यही कारण है कि भारतेन्दु जी को हिन्दी गद्य का जन्मदाता कहा जाता है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचनाएं

रचनाएँ- भारतेन्दु जी ने अपनी थोड़ी आयु मे बहुत कुछ लिखा। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं।

(क) नाटक- सत्य हरिश्चन्द्र, चन्द्रावली, भारतदुर्दशा, नीलदेवी, अन्धेरनगरी, बैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, बिषस्य विषमौषधम्‌, सती प्रताप, प्रेम योगिनी आदि।

(ख) अनूदित नाटक- मुद्राराक्षस, धनञ्जय-विजय, रत्नावली, कर्पुरमंजरी, विद्यासुन्दर, भारत-जननी, पाखण्ड-विडम्बन, दुर्लभ बन्धु आदि।

(ग) इतिहास ग्रन्थ- कश्मीर सुषमा, महाराष्ट्र देश का इतिहास, दिल्ली दरबार-दर्पण, अग्रवालों की उत्पत्ति, बादशाह दर्पण आदि।

(घ) निबन्ध तथा आख्यान- सुलोचना, मदालसा, लीलावती, परिहास-पंचक आदि।

(ड़) काव्य ग्रन्थ- प्रेम फुलवारी, प्रेमप्रलाप, विजयनी विजय, बैजयन्ती, भारत बीणा, सतसई श्रृंगार, प्रेमाश्रु वर्णन, माधुरी, प्रेम मालिका, प्रेम तरंग, प्रेम-सरोवर आदि।

भारतेन्दु जी की भाषा- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कविता में पूर्व प्रचलित ब्रजभाजा का ही प्रयोग किया किन्तु गद्य के क्षेत्र में उन्होंने खड़ी बोली को प्रतिष्ठित किया। इनकी गद्य भाषा के दो रूप है- सरल व्यावहारिक भाषा तथा शुद्ध खड़ी बोली हिन्दी। इनमें पहले प्रकार की भाषा से अरबी, फारसी तथा अंग्रेजी आदि के आम प्रचलित शब्दो का प्रयोग हुआ है जबकि दूसरे प्रकार की शुद्ध भाषा में संस्कृत के तत्सम तथा तदभव शब्दों को ही मुख्य रूप से स्थान दिया गया है। इनकी भाषा बड़ी प्रभावपूर्ण, सशक्त तथा प्रवाहशील है। मुहावरों और कहावतो के प्रयोग से भाषा सजीव हो उठी है।

भारतेन्दु जी को थोड़े समय में बहुत लिखना था। लिखे हुए को दोबारा पढ़ने के लिए उनके पास समय ही नहीं था। इस कारण उनकी भाषा में कहीं-कहीं व्याकरण सम्बन्धी त्रुटियाँ पायी जाती हैं। वास्तव में ये भाषा के धनी थे। अपने समय के सभी लेखकों में उनकी भाषा सबसे अधिक साफ-सुथरी तथा सुव्यवस्थित थी।

भारतेन्दु जी की गद्य शैली-भारतेन्दु जी की गद्य-शैली के मुख्य रूप से चार रूप पाये जाते हैं।

1. परिचयात्मक शैली-भारतेन्दु जी की इतिहास तथा यात्रा वर्णन सम्बन्धी रचनाओं में परिचयात्मक शैली का प्रयोग हुआ है। इसमेंवाक्य छोटे-छोटे तथा भाषा सरल है। मुहावरों और कहावतों का इस शैली में बहुत प्रयोग हुआ है।

2. विवेचनात्मक शैली- गम्भीर विषयों के विवेचन में इस शैली का प्रयोग किया गया है। इसमें वाक्य अपेक्षाकृत लम्बे तथा भाषा गम्भीर हो गयी है। उदाहरण प्रस्तुत है-

“प्राचीन काल के अभिनयादि के सम्बन्ध में तात्कालिक कवि लोगों की और दर्शक-मंडली की जिस प्रकार की रुचि थी, वे लोग तदनुसार ही नाटकादि की काव्य रचना करके सामाजिक लोगों का चित्त-विनोदन कर गए हैं।”

3. भावात्मक-शैली- यह भारतेन्दु जी की प्रमुख शैली है। इसमें छोटे-छोटे वाक्य तथा सरस मुहावरेदार भाषा है। इस शैली में भारतेन्दु जी का कवि रूप मुखरित हो उठा है। जीवनी तथा ऐतिहासिक निबन्धों में यह शैली जहाँ-तहाँ दिखाई पड़ती है। एक उदाहरण देखिए-

“समय-सागर में संसार एक दिन अवश्य निमग्न हो जायेगा। कालवश शशि-सूर्य भी नष्ट हो जायेंगे। आकाश के तारे भी कुछ काल पीछे न रह जायेंगे।”

4. व्यंग्यात्मक-शैली- भारतेन्दु जी हिन्दी जगत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने यह अनुभव किया कि हास्य रस के मनोरंजक गद्य साहित्य का निर्माण भी समाज के लिए आवश्यक है और उसके बिना हिन्दी के गद्य साहित्य में रोचकता तथा स्थायिता नहीं आ सकती; अतः उन्होंने अपनी गद्य भाषा में हास्य और विनोद की पुट दी। व्यंग्य और आक्षेप के द्वारा उन्होंने समाजिक कुरीतियों और अन्ध-विश्वासों का उपहास किया। एक अद्भुत अपूर्व स्वप्न’ भारतेन्दु जी की व्यंग्यात्मक शैली में लिखी गयी सुन्दर रचना है। ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? लेख से व्यंग्यात्मक शैली का उदाहरण प्रस्तुत है-

“अमेरिकन, अंग्रेज, फरांसीस आदि तुरकी ताजी सब सरपट दौड़े चले जाते हैं। सबके जी में यही है कि पाला हमीं पहले छू लें। उस समय हिन्दू काठियावाड़ी खड़े-खड़े टाप से मिट॒टी खोदते हैं। इनको औरों को जाने दीजिए, जापानी टट्टुओं को हॉफते हुए दौड़ते देखकर भी लाज नहीं आती।”

‘एक अद्भुत अपूर्व स्वप्न’ में आजकल के मूर्ख ज्योतिषियों पर किया गया यह व्यंग्य कितना मार्मिक है-

“ये लुप्तलोचन ज्योतिषाभरण बड़े उदण्ड पंडित हैं। ज्योतिष विद्या में अति कुशल हैं। कुछ नवीन तारे भी गगन में जाकर ढूँढ आये हैं और कितने ही नवीन ग्रन्थों की भी रचना कर डाली है।”

भारतेन्दु जी की शैली को समझने के लिए आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का यह कथन ध्यान देने योग्य है-

“उन्होंने (भारतेन्दु जी ने) क्रान्तिकारी हथौड़े से काम नहीं लिया। उन्होंने तो मृदु संशोधक, निपुण-वैद्य की भाँति रोगी की स्थिति की ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त कर उसकी रुचि के अनुसार उचित पथ्य की व्यवस्था की। यह की अपनी व्यवस्था है।”

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हिन्दी साहित्य में स्थान:

भारतेन्दु जी युग निर्माता साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। वे हिन्दी गद्य के जनक के रूप में जाने जाते हैं। हिन्दी भाषा को गद्य की परिष्कृत भाषा बनाने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। साहित्य की विविध विधाओं को प्रारम्भ करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिन्दी को विकसित कर एक लोकप्रिय भाषा बनाने में तथा विविध गद्य विधाओं का सूत्रपात कर उन्हें समृद्ध बनाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

भारतेन्दु हिन्दी भाषा के प्रबल समर्थक थे। उनका मत है कि अपनी भाषा की उन्नति ही सब प्रकार की उन्नति का मूल है :

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।

बिनु निजभाषा ज्ञान के मिटे न हिय को सूल।।

सुमित्रानन्दन पन्त ने लिखा है :

भारतेन्दु कर गए भारती की बीणा निर्माण।

किया अमर स्पशों ने जिसका बहु विधि स्वर संधान।।

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भारतेन्दु जी एक युग निर्माता साहित्यकार थे। उनकी प्रतिभा बहमुखी थी। उन्होंने हिन्दी साहित्य की जो आधारशिला तैयार की, उसी पर आज हिन्दी का भव्य भवन निर्मित हुआ है।

Source: PCM subject learning

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