Maithili Sharan Gupt Ka Jeevan Parichay

मैथिलीशरण गुप्त साहित्यिक जीवन परिचय – Maithili Sharan Gupt Ka Jeevan Parichay

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Maithili Sharan Gupt Ka Jeevan Parichay

जीवन परिचय

मैथिलीशरण गुप्त के जीवन में राष्ट्रीयता के भाव कूट – कूट कर भरे थे. इसी कारण उनकी सभी रचनाएं राष्ट्रीय विचारधारा से ओत – प्रोत हैं. राष्ट्र कवि गुप्त जी की प्रारभिक शिक्षा इनके अपने गाँव में ही संपन्न हुईं. इन्होंने मात्र 9 वर्ष की आयु में शिक्षा छोड़ दी थी. इसके उपरांत इन्होने स्वाध्याय द्वारा अनेक भाषाओं का ज्ञान अर्जित किया था.

गुप्त जी का मार्गदर्शन मुंशी अजमेरी जी से हुआ और 12 वर्ष की आयु में ब्रजभाषा में ‘कनकलता’ नाम से पहली कविता लिखना आरंभ किया था. महादेवी वर्मा जी के संपर्क में आने से उनकी कवितायेँ खाड़ी बोली सरस्वती में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गया था. प्रथम काव्य संग्रह “रंग में भंग” तथा बाद में “जयद्रथ वध” प्रकाशित हुई.

उन्होंने बंगाली भाषा के काव्य ग्रन्थ में ‘मेघनाथ बध’ अथवा ‘’ब्रजांगना’’ का भी अनुवाद किया था. 1912 व 1913 में राष्ट्रीयता की भावनाओं से परिपूर्ण ‘’भारत भारती’’ काव्य ग्रन्थ भी प्रकाशित हुआ था. इसमें गुप्त जी ने स्वदेश प्रेम को दर्शाते हुए वर्तमान में देश की दुर्दशा से उबरने के लिए समाधान खोजने का सम्पूर्ण प्रयोग किया था. संस्कृत भाषा का प्रमुख काव्य ग्रन्थ “स्वप्नवासवदत्ता”, महाकाव्य साकेत, उर्मिला आदि काव्य भी प्रकाशित हुए.

प्रारंभिक जीवन (Maithlisharan Gupta Early Life)

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म उत्तर प्रदेश के झाँसी के चिरगाँव में 3 अगस्त 1866 में गहोई समुदाय के कंकणे वंश में एक समृद्ध ज़मीनदार परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सेठ रामचरण गुप्त और माँ का नाम काशीबाई था। इनके पिता एक अच्छे कवि और वैष्णव धर्म को मानने वाले और भगवद भक्त भी थे। अपने पिता से प्रेरित हो कर मैथिलीशरण गुप्त जी अपने बाल्यावस्था से ही काव्य में रूचि लेने लगे थे।

शिक्षा (Maithlisharan Gupta Education)

मैथिलीशरण गुप्त जी की प्रारंभिक पढाई गावं में ही शुरू हुई। बाल्यावस्था में उन्हें स्कूल जाना पसंद नही था, जिसके कारण ये हमेशा अपने दोस्तों के साथ में घुमा करते थे। इसीलिए उनके पिता ने उन्हें घर पर ही पढ़ाने का इंतजाम कर रखा था। गुप्त जी हमेशा अपने कुछ मित्रो की मण्डली बना कर लोक-कला, लोकनाटक, लोकसंगीत किया करते थे।

घर वाले जब इनके पढाई ना करने से तंग आ गए तो इनको घर वापस बुला लिया। घर वालो के पूछने पर इनका केवल एक ही जवाब होता था जोकि सब को हैरान कर देता था। इनसे पूछने पर ये जवाब देते थे कि “मैं दुसरो की किताब क्यों पढू? मैं किताब लिखूंगा तब दुसरे लोग पढ़ेगें। ये जवाब सुनकर हर कोई हैरान हो जाता था। लेकिन बाद में यही बात सत्य हुई। जब ये बड़े हुए तो इनकी कविता के प्रसिद्ध होने के कारण इनको राष्ट्रकवि की उपाधि भी मिली।

साहित्य कार्य का सफ़र (Maithlisharan Gupta Literature)

पढाई छुटने से इनका पढाई अधूरी रह गई, जिससे इन्होने घर पर ही हिंदी, बांगला, हिंदी साहित्य का अध्ययन के साथ-साथ धर्म ग्रन्थ श्रीमद्भागवत गीता, रामायण का अध्यन किया और महाभारत घर में ना होने से इन्होने बाहर से महाभारत लाकर उसको पढ़ा। बहुत सी पत्रिकाओ में हिंदी कविताए लिखकर गुप्त ने हिंदी साहित्य में प्रवेश किया था, जिनमे सरस्वती भी शामिल है।

1910 में इनकी पहली काव्य संग्रह “रंग में भेद” और उसके बाद दूसरी “जयद्रथ वध” भी प्रकाशित हुई। मैथिलीशरण गुप्त जी ने बंगाली काव्यग्रंथ “मेघनाथ वध” का अनुवाद ब्रज में किया जिसे इंडियन प्रेस ने पब्लिश किया था।

1912 में सेनानी संग्राम से प्रेरित होकर राष्ट्रीय भावना से इन्होने “भारत भारती” लिखा और उसका प्रकाशन हुआ। साथ ही उनकी राष्ट्रिय कविताए भारतीयों के बीच काफी प्रसिद्ध हुई, साथ ही जो भारतीय आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे थे उनके लिए भी यह कविताए काफी प्रेरणादायी साबित हुई। जिससे उनकी लोकप्रियता पूरे भारत में प्रसर गई।

मैथिलीशरण गुप्त जी ने संस्कृत के प्रसिद्ध ग्रन्थ “स्वप्नवासवदत्ता” का इन्होने अनुवाद किया। कुछ सालो के बाद इन्होने ने अपनी पुस्तक छपवाने के लिए खुद के प्रेस की स्थापना की। मैथिलीशरण गुप्त जी “साकेत” और “पंचवटी” जैसे लेख को लिखा और उसको प्रकाशित किया।

अपने उसी समय में ये महात्मा गांधी जी के करीब आये, और सन 1932 में गाँधी जी ने इनको राष्ट्रकवि की उपाधि प्रदान की। और उसी समय इन्होने “यशोधरा” भी लिखी। राष्ट्रकवि की उपाधि मिलने के बाद अगर विश्वविद्यालय से इनको दी.लिट् से सम्मानित किया गया।

सत्याग्रह आन्दोलन के चलते ये एक बार जेल भी गए। मैथिलीशरण गुप्त जी को सन 1953 में भारत सरकार द्वारा “पद्मभूषण” से नवाजा गया। गुप्त जी ने सन 1952-64 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मैथिलीशरण गुप्त जी को अभिनन्दन ग्रन्थ भेट किया। उसके कुछ समय पश्चात गुप्त जी को हिन्दू विश्वविधालय के द्वारा भी दी.लिट् से सम्मानित किया गया।

उनकी ज्यादातर कविताए हमें रामायण, महाभारत और बुद्धा के समय की दिखाई देती है और साथ ही उस समय के प्रसिद्ध इंसानों का चित्रण भी हमें उनकी कविताओ में दिखाई देता है। उनके प्रसिद्ध कार्य, साकेत में हमें रामायण के लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला का वर्णन भी दिखाई देता है। साथ ही उनकी दूसरी रचना जैसे, यशोधरा में हमें गौतम बुद्धा की पत्नी यशोधरा का वर्णन दिखाई देता है।

मृत्यु (Maithili Sharan Death)

मैथिलीशरण गुप्त 7 दिसम्बर 1964 को अपने घर चिरगावं वापस लौट आये और 12 दिसंबर 1964 को इनको अचानक से दिल का दौरा पड़ा और इनका हो गया। उस दिन भारत का एक महान कवि जिसे भारत का राष्ट्रकवि कहा जाता था वो इस दुनिया से विदा लेकर हमेशा हमेशा के लिए दुनिया को छोड़ कर चला गया।

जयन्ती

मध्य प्रदेश के संस्कृति राज्य मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने कहा है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती प्रदेश में प्रतिवर्ष तीन अगस्त को ‘कवि दिवस’ के रूप में व्यापक रूप से मनायी जायेगी। यह निर्णय राज्य शासन ने लिया है। युवा पीढ़ी भारतीय साहित्य के स्वर्णिम इतिहास से भली-भांति वाकिफ हो सके इस उद्देश्य से संस्कृति विभाग द्वारा प्रदेश में भारतीय कवियों पर केन्द्रित करते हुए अनेक आयोजन करेगा।

कृतियाँ

महाकाव्य- साकेत, जयभारत

काव्यकृतियाँ- तिलोत्तमा, चजयद्रथ वध, भारत-भारती, पंचवटी, द्वापर, सिद्धराज, नहुष, अंजलि और अर्घ्य, अजित, अर्जन और विसर्जन, काबा और कर्बला, किसान, कुणाल गीत, गुरु तेग बहादुर, गुरुकुल ,पलासी का युद्ध, झंकार , पृथ्वीपुत्र, वक संहार , शकुंतला, विश्व वेदना, राजा प्रजा, विष्णुप्रिया, उर्मिला, लीला , प्रदक्षिणा, दिवोदास , भूमि-भाग

नाटक – रंग में भंग , राजा-प्रजा, वन वैभव , विकट भट , विरहिणी , वैतालिक, शक्ति, सैरन्ध्री , स्वदेश संगीत, हिड़िम्बा , हिन्दू, चंद्रहास

मैथिलीशरण गुप्त ग्रन्थावली (मौलिक तथा अनूदित समग्र कृतियों का संकलन 12 खण्डों में, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित, लेखक-संपादक : डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल

फुटकर रचनाएँ- केशों की कथा, स्वर्गसहोदर, ये दोनों मंगल घट (मैथिलीशरण गुप्त द्वारा लिखी पुस्तक) में संग्रहीत हैं।

अनूदित (मधुप के नाम से)-

संस्कृत- स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिमा, अभिषेक, अविमारक (भास) (गुप्त जी के नाटक देखें), रत्नावली (हर्षवर्धन)

बंगाली- मेघनाद वध, विहरिणी ब्रजांगना(माइकल मधुसूदन दत्त), पलासी का युद्ध (नवीन चंद्र सेन)

फारसी- रुबाइयात उमर खय्याम (उमर खय्याम)

काविताओं का संग्रह – उच्छवास

पत्रों का संग्रह – पत्रावली

गुप्त जी के नाटक

उपरोक्त नाटकों के अतिरिक्त गुप्त जी ने चार नाटक और लिखे जो भास के नाटकों पर आधारित थे। निम्नलिखित तालिका में भास के अनूदित नाटक और उन पर आधारित गुप्त जी के मौलिक नाटक दिए हुए हैं :-

गुप्त जी के मौलिक नाटक: अनघ, चरणदास, तिलोत्तमा, निष्क्रिय प्रतिरोध भास जी के अनूदित नाटक: स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिमा, अभिषेक, आविमारक

काव्यगत विशेषताएँ

गुप्त जी के काव्य में राष्ट्रीयता और गांधीवाद की प्रधानता है। इसमें भारत के गौरवमय अतीत के इतिहास और भारतीय संस्कृति की महत्ता का ओजपूर्ण प्रतिपादन है। आपने अपने काव्य में पारिवारिक जीवन को भी यथोचित महत्ता प्रदान की है और नारी मात्र को विशेष महत्व प्रदान किया है। गुप्त जी ने प्रबंध काव्य तथा मुक्तक काव्य दोनों की रचना की। शब्द शक्तियों तथा अलंकारों के सक्षम प्रयोग के साथ मुहावरों का भी प्रयोग किया है।

भारत भारती में देश की वर्तमान दुर्दशा पर क्षोभ प्रकट करते हुए कवि ने देश के अतीत का अत्यंत गौरव और श्रद्धा के साथ गुणगान किया। भारत श्रेष्ठ था, है और सदैव रहेगा का भाव इन पंक्तियों में गुंजायमान है-

भूलोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ?

फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल कहाँ?

संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?

उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है।

मैथिलीशरण गुप्त को आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का मार्गदर्शन प्राप्त था । आचार्य द्विवेदी उन्हें कविता लिखने के लिए प्रेरित करते थे, उनकी रचनाओं में संशोधन करके अपनी पत्रिका ‘सरस्वती’ में प्रकाशित करते थे। मैथिलीशरण गुप्त की पहली खड़ी बोली की कविता ‘हेमन्त’ शीर्षक से सरस्वती (१९०७ ई०) में छपी थी।

उनके द्वारा लिखित खंडकाव्य पंचवटी आज भी कविता प्रेमियों के मानस पटल पर सजीव है।

दद्दा (मैथिलीशरण गुप्त)-महादेवी वर्मा

मैं गुप्त जी को कब से जानती हूं, इस सीधे से प्रश्न का मुझसे आज तक कोई सीधा-सा उत्तर नहीं बन पड़ा। प्रश्न के साथ ही मेरी स्मृति अतीत के एक धूमिल पृष्ठ पर उंगली रख देती है जिस पर न वर्ष, तिथि आदि की रेखाएँ हैं और न परिस्थितियों के रंग। केवल कवि बनने के प्रयास में बेसुध एक बालिका का छाया-चित्र उभर आता है।

ब्रजभाषा में जिनका कविकंठ फूटा है उनके निकट समस्यापूर्ति की कल्पना-व्यायाम अपरिचित न होगा। कवि बनने की तीव्र इच्छा रहते हुए भी मुझे यह अनुष्ठान गणि की पुस्तकों के सवाल जैसी अप्रिय लगता था, क्योंकि दोनों ही में उत्तर पहले निश्चित रहता है और विद्यार्थी को उन तक पहुंचने का टेढ़ा-मेढ़ा क्रम खोज निकालना पड़ता है। पंडित जी गणित के प्रश्नों के संबंध में जितने मुक्तहस्त थे, समस्याओं के विषय में भी उतने ही उदार थे। अतः दर्जनों गणित के प्रश्नों और समस्याओं के बीच में दौड़ लगाते-लगाते मन कभी समझ नहीं पाता था कि गणित के प्रश्नों का हल करना सहज है अथवा समस्या की पूर्ति।

कल्पना के किसी अलक्ष्य दलदल में आकंठ ही नहीं, आशिखा मग्न किसी उक्ति को समस्या रूपी पूँछ पकड़कर बाहर खींच लाने में परिश्रम कम नहीं पड़ता था। इस परिश्रम के नाप-तोल का कोई साधन नहीं था, पर सबसे अधिक अखरता था किसी सहृदय दर्शक का अभाव। कभी बाहर बैठक की मेज पर बैठ कर, कभी भीतर तख्त पर लेट कर और कभी आम की डाल पर समासीन होकर मैं अपने शोध-कार्य में लगी रहती थी। उक्ति को पाते ही सरकंडे की कलम की चौड़ी नोक से मोटे अक्षरों की जंजीर से बांधकर कैद कर देती थी। तब कान, गाल आदि पर लगी स्याही ही मेरी उज्ज्वल विजय का विज्ञापन बन जाती थी।

ऐसे ही एक उक्ति-अहेर में मेरे हाथ में ऐसी पूंछ आ गई जिसका वास्तविक अधिकारी मेरे ज्ञात-जगत की सीमा में नहीं था। ‘मेघ बिना जलवृष्टि भई है।’ अवश्य ही यह समस्या किसी प्रकार पंडित जी की दृष्टि से बचाकर ऐसी समस्या के बाड़े में प्रवेश पा गई जो मेरे लिए ही सुरक्षित थी, क्योंकि साधारणतः पंडित मेरे अनुभव की सीमा का ध्यान रखते थे। बचपन में जिज्ञासा इतनी तीव्र होती है कि बिना कार्य कारण स्पष्ट किए एक पग बढ़ना भी कठिन हो जाता है। बादल पानी बिना बरसाए हुए रह सकते हैं, परंतु पानी तो उनके बिना बरस नहीं सकता। उस सम लक्षणा-व्यंजना की गुंजाइश नहीं थी, अतः मन में बारंबार प्रश्न उठने लगा, बादलों के बिना पानी कैसे बरसा और यदि बरसा तो किसने बरसाया ?

प्रयत्न करते-करते मेरे माछे और लगा पर स्याही से हिंदुस्तान की रेलवे-लाइन का नक्शा बन गया और मेरे सकंडे की कलम की परोक टूट गई, पर वह उक्ति न मिल सकी जो मेघों के रूठ जाने पर पानी बरसाने का कार्य कर सके।

अतीत के अनेक राजा रानियों और घटनाओं को मैं कल्लू की माँ की आँखों में देखती थी। विधि निषेध के अनेक सूत्रों की वह व्याख्याकार थी। मेघ रहित वृष्टि के संबंध में भी मैंने अपनी धृतराष्ट्रता स्वीकार उसी की सहायता चाही। समस्या जैसे मेरे ज्ञान की परिधि के परे थी, आकाश के हस्ती नक्षत्र का नक्षत्रत्व वैसे ही उसके विश्वास की सीमा के बाहर था। वह जानती थी कि आकाश का हाथी सूंड में पानी भर कर उंडेल देता है तब तक कई-कई दिन तक वर्षा की झड़ी लगी रहती है। मैंने सोचा हो-न-हो मेघों की बेगार ढोने वाला ही स्वर्ग का बेकार हाथी समस्या का लक्ष्य है। पर इस कष्टप्रद निष्कर्ष को सवैया में कैसे उतारा जाय ? इसी प्रश्न में कई दिन बीत गए। उन्हीं दिनों सरस्वती पत्रिका और उसमें प्रकाशित गुप्त जी की रचनाओं से मेरा नया-नया परिचय हुआ था। बोलने की भाषा में कविता लिखने की सुविधा मुझे बार-बार खड़ी बोली की कविता की ओर आकर्षित करती थी। इसके अतिरिक्त रचनाओं से ऐसा आभास नहीं मिलता था कि उनके निर्माताओं ने मेरी तरह समस्या पूर्ति का कष्ट झेला है। उन कविताओं के छंदबंध भी सवैया छंदों में सहज जान पड़ते थे और अहो-कहो आदि तुक तो मानो मेरे मन के अनुरूप ही गढ़े गये थे।

अंत में मैंने ‘मेघ बिना जलवृष्टि भई है’ का निम्न पंक्तियों में काया-कल्प किया—

हाथी न अपनी सूंड में यदि नीर भल लाता अहो;

तो किस तरह बादल बिना जलवृष्टि हो सकती कहो !

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समस्यापूर्ति के स्थान में जब मैंने यह विचित्र तुकबंदी पंडित जी के सामने रखी तब वे विस्मय से बोल उठे, ‘अरे, यह यहां भी पहुंच गए। उनका लक्ष्य मेरी खड़ी बोली के कवि थे अथवा काव्य, यह आज बताना संभव नहीं। पर उस दिन खड़ी बोली की तुकबंदी से मेरा जो परिचय हुआ उसे मैं गुप्तजी का परिचय मानती हूं। उसके उपरांत मैं जो कुछ लिखती उसके अंत में अहो जैसा तुकांत रख कर उसे खड़ी बोली का जामा पहना देती। राजस्थान की एक गाथा भी मैंने हरिगीतिका छंद में लिख डाली थी, जिसके खो जाने के कारण मुझे एक हंसने योग्य कृतित्व से मुक्ति मिल गई है।

गुप्त जी की रचनाओं से मेरा जितना दीर्घकालीन परिचय है उतना उनसे नहीं। उनका एक चित्र, जिसमें दाढ़ी और पगड़ी साथ उत्पन्न हुई-सी जान पड़ती है, मैंने तब देखा जब मैं काफी समझदार हो गई थी। पर तब भी उनकी दाढ़ी देखकर मुझे अपने मौलवी साहब का स्मरण हो आता था। यदि पहले मैंने वह चित्र देखा होता तो, खड़ी बोली की काव्य-रचना का अंत उर्दू की पढ़ाई के समान होता या नहीं, यह कहना कठिन है।

गुप्त जी के बाह्य दर्शन में ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें असाधारण सिद्ध कर सके। साधारण मझोला कद, साधारण छरहरा गठन, साधारण गहरा गेहुआं या हल्का सांवला रंग, साधारण पगड़ी, अंगरखा, धोती, या उसकी आधुनिक सस्करण, गांधी टोपी, कुरता-धोती और इस व्यापक भारतीयता से सीमित सांप्रदायिकता का गठबंधन-सा करती हुई तुलसी कंठी।

Credit-
stable class

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